आगरा डायट में ‘क्रियात्मक अनुसंधान: सिद्धांत से अभ्यास तक’ कार्यशाला, शिक्षकों ने सीखे विद्यालयी समस्याओं के समाधान के तरीके
अवलोकन, योजना और प्रयोग के जरिए कक्षा की समस्याओं के समाधान पर दिया गया जोर
एस. शेरवानी (ब्यूरो चीफ़)
आगरा। विद्यालयों में शिक्षण प्रक्रिया को बेहतर बनाने और कक्षा-कक्ष से जुड़ी वास्तविक समस्याओं के व्यावहारिक समाधान तलाशने के उद्देश्य से जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (DIET) आगरा के रिसर्च एवं इनोवेशन सेल में एक दिवसीय ‘क्रियात्मक अनुसंधान: सिद्धांत से अभ्यास तक’ कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला का आयोजन डायट प्राचार्य विजय प्रताप सिंह के निर्देशन में किया गया।
कार्यशाला में जनपद के एआरपी, एसआरजी और शिक्षकों ने प्रतिभाग किया। विशेषज्ञों ने क्रियात्मक अनुसंधान की अवधारणा, उसकी प्रक्रिया और विद्यालय स्तर पर इसके व्यावहारिक उपयोग को उदाहरणों के माध्यम से समझाया। प्रतिभागियों को अपनी कक्षा और विद्यालय से जुड़ी समस्याओं को पहचानकर उनके संभावित समाधान खोजने के लिए अनुसंधान आधारित दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित किया गया।
विद्यालय की वास्तविक समस्याओं से निकले समाधान: विजय प्रताप सिंह

कार्यशाला के दौरान डायट प्राचार्य विजय प्रताप सिंह ने कहा कि विद्यालय में सामने आने वाली समस्याओं के समाधान के लिए शिक्षकों को अपने आसपास की परिस्थितियों का बारीकी से अवलोकन करना चाहिए।
उन्होंने शिक्षकों से कहा कि वे केवल समस्या की पहचान तक सीमित न रहें, बल्कि उसके कारणों को समझते हुए समाधान की दिशा में व्यवस्थित प्रयास करें। उन्होंने प्रतिभागियों को दोनों सत्रों में क्रियात्मक अनुसंधान से जुड़े विभिन्न प्रश्न पूछने और अपनी जिज्ञासाओं को सामने रखने के लिए भी प्रेरित किया।
उन्होंने कहा कि कक्षा से संबंधित समस्याओं पर लगातार सवाल करना, उनका अवलोकन करना और संभावित समाधानों को आजमाना शिक्षण प्रक्रिया में सुधार का आधार बन सकता है।
सबसे पहले शिक्षकों ने चुनीं विद्यालय से जुड़ी समस्याएं

कार्यशाला के संयोजन की जिम्मेदारी प्रभारी डॉ. प्रज्ञा शर्मा एवं लक्ष्मी शर्मा ने संभाली। कार्यक्रम की शुरुआत में शिक्षकों से उनके विद्यालयों में सामने आने वाली वास्तविक समस्याओं की पहचान और चुनाव कराया गया।
इस गतिविधि का उद्देश्य यह समझना रहा कि क्रियात्मक अनुसंधान किसी केवल सैद्धांतिक विषय तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षक अपने विद्यालय की रोजमर्रा की समस्याओं पर भी इसे लागू कर सकते हैं।
शिक्षकों ने विद्यालय और कक्षा-कक्ष से जुड़ी विभिन्न समस्याओं को सामने रखा और उनके समाधान के लिए संभावित शोध विषयों का चयन किया।
क्रियात्मक अनुसंधान के चार प्रमुख चरण बताए

कार्यशाला के प्रथम सत्र का संचालन प्रो. एन.पी. चंदेल, डीन शिक्षाशास्त्र, दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट द्वारा किया गया।
उन्होंने क्रियात्मक अनुसंधान को एक गतिशील और क्रमिक विकास की प्रक्रिया के रूप में समझाया। उन्होंने बताया कि क्रियात्मक शोध में चार प्रमुख चरण होते हैं—योजना, क्रिया, अवलोकन और प्रतिक्रिया।
उन्होंने प्रतिभागियों को समझाया कि किसी विद्यालयी समस्या पर काम करने के लिए पहले उसकी पहचान और योजना तैयार करना, उसके बाद निर्धारित योजना के अनुसार क्रिया करना, परिणामों का अवलोकन करना और फिर प्राप्त अनुभव एवं परिणाम के आधार पर प्रतिक्रिया देना आवश्यक है।
इस पूरी प्रक्रिया के माध्यम से शिक्षक अपनी शिक्षण पद्धति में आवश्यक सुधार कर सकते हैं।
शोध और क्रियात्मक शोध के बीच समझाया अंतर
प्रथम सत्र में प्रो. एन.पी. चंदेल ने सामान्य शोध और क्रियात्मक शोध को धरातलीय स्तर पर समझाने का प्रयास किया। उन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में समस्याओं के चयन की प्रक्रिया के बारे में जानकारी दी।
शिक्षकों को बताया गया कि क्रियात्मक अनुसंधान का उद्देश्य विद्यालय में मौजूद किसी वास्तविक समस्या को पहचानना और उसके समाधान के लिए व्यवस्थित तरीके से कार्य करना है। इससे शिक्षक अपने अनुभवों और अवलोकन के आधार पर शिक्षण प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने के प्रयास कर सकते हैं।
सत्र के दौरान प्रतिभागियों को सवाल पूछने और अपनी विद्यालयी परिस्थितियों के अनुसार विषयों को समझने का अवसर भी मिला।
विद्यालयी परिवेश और विद्यार्थियों की समस्याओं पर हुआ दूसरा सत्र
कार्यशाला के दूसरे सत्र का संचालन अंजना वर्मा, असिस्टेंट प्रोफेसर, दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट ने किया।
उन्होंने विद्यालय के परिवेश तथा विद्यार्थियों के अध्ययन-अध्यापन से जुड़ी विभिन्न समस्याओं को उदाहरणों के माध्यम से समझाया। साथ ही इन समस्याओं के संभावित समाधान और उन्हें क्रियात्मक अनुसंधान के माध्यम से समझने की प्रक्रिया पर चर्चा की।
उन्होंने शिक्षकों को यह समझाने का प्रयास किया कि विद्यार्थियों की सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले कारणों को पहचानकर उनके आधार पर कार्ययोजना तैयार की जा सकती है।
एआरपी, एसआरजी और शिक्षकों ने बनाई कार्ययोजना
कार्यशाला के दौरान जनपद के एआरपी, एसआरजी और शिक्षकों ने विद्यालयों से संबंधित चयनित समस्याओं पर क्रियात्मक शोध के महत्वपूर्ण बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए कार्ययोजना तैयार की।
प्रतिभागियों ने समूह स्तर पर चर्चा करते हुए समस्या की पहचान, संभावित कारण, समाधान के प्रयास और उनके परिणामों के अवलोकन से जुड़े पहलुओं पर विचार किया।
इस गतिविधि के माध्यम से शिक्षकों को यह समझने का अवसर मिला कि अपने विद्यालय में सामने आने वाली समस्या को किस प्रकार एक व्यवस्थित क्रियात्मक अनुसंधान प्रक्रिया में बदला जा सकता है।
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सिद्धांत के साथ व्यावहारिक अभ्यास पर रहा जोर
कार्यशाला की विशेषता यह रही कि इसमें क्रियात्मक अनुसंधान को केवल सैद्धांतिक रूप से समझाने के बजाय प्रतिभागियों को व्यावहारिक गतिविधियों से भी जोड़ा गया।
शिक्षकों ने अपने विद्यालय की वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर समस्याओं का चुनाव किया और उनके समाधान की दिशा में कार्ययोजना बनाने का अभ्यास किया। इससे प्रतिभागियों को यह समझने में मदद मिली कि अनुसंधान आधारित दृष्टिकोण को दैनिक शिक्षण कार्य में किस प्रकार शामिल किया जा सकता है।
कार्यशाला में शिक्षकों ने उत्साहपूर्वक प्रतिभाग किया और विशेषज्ञों के साथ अपने अनुभव एवं विचार साझा किए।
शिक्षण गुणवत्ता सुधार में उपयोगी हो सकता है क्रियात्मक अनुसंधान
कार्यशाला में सामने आया कि क्रियात्मक अनुसंधान शिक्षकों को अपने विद्यालय और कक्षा की समस्याओं को अधिक व्यवस्थित ढंग से देखने का अवसर देता है।
विद्यार्थियों की सीखने की गति, कक्षा में सहभागिता, अध्ययन-अध्यापन का वातावरण या अन्य विद्यालयी परिस्थितियों से जुड़ी समस्याओं को पहचानकर उनके समाधान के लिए छोटे स्तर पर प्रयोग किए जा सकते हैं। इन प्रयोगों के परिणामों का अवलोकन करके आगे की शिक्षण रणनीति में आवश्यक बदलाव किए जा सकते हैं।
इस तरह शिक्षक अपने अनुभवों को भी शिक्षण सुधार की प्रक्रिया का हिस्सा बना सकते हैं।
तकनीकी संयोजन और संचालन की जिम्मेदारी निभाई
कार्यशाला का तकनीकी संयोजन पुष्पेंद्र सिंह द्वारा किया गया। वहीं मंच संचालन की जिम्मेदारी लक्ष्मी शर्मा ने निभाई।
वरिष्ठ प्रवक्ता विजय सिंह एवं ललित पाल सिंह ने प्रतिभागी शिक्षकों का उत्साहवर्धन किया और कार्यशाला के सफल आयोजन के लिए सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया।
कार्यशाला में प्रवक्ता अनिल कुमार, यशवीर सिंह, डॉ. मनोज कुमार वार्ष्णेय, रंजना पांडे, यशपाल सिंह, डॉ. दिलीप कुमार गुप्ता, रचना यादव, संजीव कुमार सत्यार्थी सहित अन्य शिक्षक एवं डायट के प्रवक्ता उपस्थित रहे।
शिक्षकों के लिए सीखने और प्रयोग का अवसर
एक दिवसीय कार्यशाला के माध्यम से शिक्षकों को यह समझने का अवसर मिला कि विद्यालय में मौजूद समस्याओं को केवल कठिनाई के रूप में देखने के बजाय उनके समाधान के लिए व्यवस्थित तरीके से काम किया जा सकता है।
विशेषज्ञों के मार्गदर्शन और व्यावहारिक गतिविधियों के माध्यम से प्रतिभागियों ने योजना, क्रिया, अवलोकन और प्रतिक्रिया की प्रक्रिया को समझा। साथ ही अपने विद्यालय की परिस्थितियों के अनुसार क्रियात्मक अनुसंधान के लिए विषय चयन और कार्ययोजना तैयार करने का अभ्यास किया।
कार्यशाला का उद्देश्य शिक्षकों को शोध की प्रक्रिया से जोड़ते हुए उनकी कक्षा-कक्ष की वास्तविक समस्याओं के समाधान के लिए उन्हें अधिक व्यवस्थित और प्रयोगात्मक दृष्टिकोण उपलब्ध कराना रहा।


