Agra Breaking News: जैविक खेती और श्री अन्न वर्तमान समय की आवश्यकता | डायट आगरा में अंकुरण कृषि प्रदर्शनी
डायट आगरा में आयोजित दो दिवसीय “अंकुरण” कृषि प्रदर्शनी में प्रो. राजवीर सिंह ने जैविक खेती और श्री अन्न (मिलेट्स) को वर्तमान समय की आवश्यकता बताया। कार्यक्रम में पर्यावरण संरक्षण, पोषण और टिकाऊ कृषि पर विशेषज्ञों ने विचार रखे।

जैविक खेती एवं श्री अन्न आज के वर्तमान समय की अनिवार्य आवश्यकता – प्रो. राजवीर सिंह
एस. शेरवानी (ब्यूरो चीफ़)
आगरा, 22 जनवरी 2026।
आगरा। शिक्षक शिक्षा योजनान्तर्गत प्रशिक्षण एवं शैक्षिक गतिविधियों के वार्षिक लक्ष्य के प्रभावी क्रियान्वयन के क्रम में जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान आगरा में कृषि एवं पर्यावरण संरक्षण को केंद्र में रखकर दो दिवसीय “अंकुरण” कृषि प्रदर्शनी एवं पर्यावरण संरक्षण कार्यक्रम का भव्य शुभारंभ किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य भावी शिक्षकों, डीएलएड प्रशिक्षुओं तथा शिक्षकों को जैविक खेती, श्री अन्न (मिलेट्स) और पर्यावरण-संवेदनशील जीवनशैली के प्रति जागरूक करना है, ताकि वे इस ज्ञान को विद्यालयों और समाज तक प्रभावी ढंग से पहुँचा सकें।
बदलते समय में कृषि की भूमिका
प्रथम दिवस आयोजित मुख्य व्याख्यान में आरबीएस कॉलेज, आगरा के वरिष्ठ प्राध्यापक प्रो. राजवीर सिंह ने कहा कि वर्ष 1950 के दशक में भारत की अर्थव्यवस्था का 50 प्रतिशत से अधिक योगदान कृषि से आता था। आज भारत तकनीकी और आर्थिक रूप से सशक्त हुआ है, परंतु खेती की प्रासंगिकता आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि आधुनिक रासायनिक खेती ने उत्पादन तो बढ़ाया, लेकिन इसके साथ ही मिट्टी की उर्वरता, जल संसाधनों और मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव भी डाला है। ऐसे में जैविक खेती न केवल पर्यावरण की रक्षा करती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भविष्य भी सुनिश्चित करती है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि जैविक खेती से भूमि की प्राकृतिक शक्ति बनी रहती है, किसानों की लागत कम होती है और उपभोक्ताओं को सुरक्षित व पोषक भोजन मिलता है। यह खेती पद्धति सतत विकास के मूल सिद्धांतों से जुड़ी हुई है।
श्री अन्न: स्वास्थ्य, पोषण और आत्मनिर्भरता का आधार

कार्यक्रम में कृषि सलाहकार सलीम अली खां ने श्री अन्न विषय पर विस्तृत व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने रामदाना, बाजरा, ज्वार, रागी, कुटकी, समा चावल जैसे मोटे अनाजों के पोषण तत्वों की जानकारी देते हुए कहा कि ये अनाज प्रोटीन, फाइबर, आयरन, कैल्शियम और सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। यदि श्री अन्न को दैनिक आहार में शामिल किया जाए तो मधुमेह, हृदय रोग, मोटापा और पाचन संबंधी समस्याओं से बचाव संभव है।
उन्होंने यह भी बताया कि श्री अन्न न केवल स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभकारी हैं, बल्कि किसानों के लिए कम लागत और अधिक लाभ का साधन भी हैं, जिससे कृषि आत्मनिर्भरता को बल मिलता है।
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शिक्षक शिक्षा में कार्यक्रम की उपयोगिता
उप शिक्षा निदेशक एवं डायट प्राचार्य अनिरुद्ध यादव ने अपने संबोधन में कहा कि वर्तमान समय में शिक्षक केवल पाठ्यपुस्तक तक सीमित न रहें, बल्कि जीवनोपयोगी विषयों को भी विद्यार्थियों तक पहुँचाएँ। जैविक खेती और श्री अन्न जैसे विषयों को शिक्षण से जोड़कर ही हम नई पीढ़ी में स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास की समझ विकसित कर सकते हैं। उन्होंने दो दिवसीय “अंकुरण” कार्यक्रम को शिक्षक-प्रशिक्षण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।
प्रदर्शनी और सहभागिता से बढ़ेगा व्यवहारिक ज्ञान

नोडल प्रभारी प्रवक्ता पुष्पेंद्र सिंह ने जानकारी दी कि कार्यक्रम के दूसरे दिन गूगल फॉर्म के माध्यम से पंजीकृत प्रतिभागी शिक्षक एवं डीएलएड प्रशिक्षु कृषि प्रदर्शनी का आयोजन करेंगे। इस प्रदर्शनी में जैविक उत्पाद, मिलेट्स आधारित खाद्य सामग्री, पर्यावरण संरक्षण के मॉडल और नवाचार प्रस्तुत किए जाएंगे, जिससे व्यवहारिक ज्ञान को बढ़ावा मिलेगा।
कार्यक्रम का कुशल संचालन प्रवक्ता डॉ. मनोज कुमार वार्ष्णेय द्वारा किया गया। इस अवसर पर प्रवक्ता अनिल कुमार, यशवीर सिंह, कल्पना सिन्हा, डॉ. प्रज्ञा शर्मा, लक्ष्मी शर्मा, अबू मोहम्मद आसिफ, धर्मेंद्र प्रसाद गौतम, हिमांशु सिंह, यशपाल सिंह, संजीव कुमार सत्यार्थी, रचना यादव सहित समस्त डायट स्टाफ की सक्रिय सहभागिता रही।
समाज के लिए संदेश

“अंकुरण” कार्यक्रम के माध्यम से यह संदेश स्पष्ट रूप से सामने आया कि जैविक खेती, श्री अन्न और पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी योजनाएँ नहीं, बल्कि जन-आंदोलन का स्वरूप लेने चाहिए। शिक्षक और प्रशिक्षु इस परिवर्तन के प्रमुख वाहक बन सकते हैं। यदि विद्यालय स्तर से ही बच्चों में स्वस्थ आहार, प्रकृति संरक्षण और जिम्मेदार जीवनशैली की समझ विकसित की जाए, तो निश्चित रूप से एक स्वस्थ, समृद्ध और पर्यावरण-संतुलित भारत की नींव रखी जा सकती है।
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