Kheragarh Breaking: खेरागढ़ के परिषदीय विद्यालय के बच्चों का फतेहपुर सीकरी शैक्षिक भ्रमण | बुलंद दरवाजा देखकर बच्चे हुए आश्चर्यचकित
खेरागढ़ ब्लॉक के परिषदीय विद्यालय के बच्चों ने प्रधानाध्यापक जयवीर सिंह की पहल पर फतेहपुर सीकरी का शैक्षिक भ्रमण किया। बुलंद दरवाजा, दरगाह और महलों को देखकर बच्चे उत्साह से भर उठे। गांव वालों ने शिक्षक की प्रशंसा की।

खेरागढ़ के परिषदीय विद्यालयों के बच्चों की यादगार शैक्षिक यात्रा
फतेहपुर सीकरी की ऐतिहासिक धरोहरों ने बच्चों की आँखों में भरा आश्चर्य—प्रधानाध्यापक जयवीर सिंह ने अपने खर्चे पर कराई पूरी यात्रा
एस. शेरवानी (ब्यूरो चीफ़)
आगरा | खेरागढ़, 16 नवम्बर 2025
खेरागढ़ के ग्रामीण इलाकों के लिए शनिवार का दिन कुछ अलग था।
जेसीबी का शोर, खेतों में मशीनों की गूंज और गाँव की रोज़मर्रा की हलचल के बीच प्राथमिक विद्यालय गडरपुरा और सरेंडा के बच्चों की एक बस—उत्साह से भरी आंखों, हँसी, जिज्ञासा और सपनों को लेकर—फतेहपुर सीकरी की ओर रवाना हुई।
यह यात्रा किसी सरकारी योजना या कार्यक्रम का हिस्सा नहीं थी, बल्कि प्रधानाध्यापक जयवीर सिंह सिकरवार की निजी पहल थी—
और सबसे खास बात यह कि पूरा खर्च उन्होंने स्वयं उठाया, ताकि किसी बच्चे का सपना आर्थिक कमी के कारण न छूट जाए।
सुबह की शुरुआत—गाँव की गलियों से निकलती मासूम जिज्ञासा
सुबह-सुबह जब बच्चे स्कूल पहुँच रहे थे—
किसी ने माँ का हाथ पकड़ा था, कोई पानी की बोतल संभाल रहा था, किसी के चेहरे पर पहली स्कूल ट्रिप का उत्साह चमक रहा था।
एक 9 वर्षीय छात्रा ने धीरे से कहा—
“मैडम, मैंने बुलंद दरवाजा सिर्फ किताब में देखा था… आज असली में देखूँगी।”
यही वह पंक्ति थी, जिसने इस शैक्षिक भ्रमण का असली महत्व साबित कर दिया।
फतेहपुर सीकरी—जहाँ इतिहास, संस्कृति और वास्तुकला बच्चों की आँखों के सामने जीवंत हो उठी

बस जैसे ही फतेहपुर सीकरी के मुख्य प्रवेश द्वार पर पहुँची, बच्चों का उत्साह अपनी चरम पर था।
इतिहास की किताबों में जो सभ्यता और वैभव उन्होंने पढ़ा था, वह आज उनकी आँखों के सामने था।
1. बुलंद दरवाजा –
जब बच्चे इसकी विशाल ऊँचाई के नीचे खड़े हुए, उनकी गर्दन ऊपर उठते-उठते थक गई।
उन्होंने एक-दूसरे से कान में कहा—
“इतना बड़ा! इसे बनाने में कितने साल लगे होंगे?”
किसी भवन की भव्यता से पहली बार चकित होने की वह मासूमियत… शिक्षकों के लिए भी भावुक पल था।
2. सूफी सलीम चिश्ती की दरगाह –
यहां पहुँचकर बच्चों के कदम धीमे हो गए।
उनके चेहरे पर सम्मान और शांति दोनों झलक रहे थे।
सफेद संगमरमर की जालियाँ, मीनारों की बारीक कारीगरी और सूफी संस्कृति का शांत वातावरण—
बच्चों को इतिहास के अध्यायों से कहीं ज्यादा गहराई से समझा गया।
3. चार चमन और महल परिसर –
यहां बच्चों ने देखा कि कैसे मुगल वास्तुकला में पानी, बगीचों और इमारतों का समन्वय प्राकृतिक सुंदरता पैदा करता है।
एक बच्चे ने पूछा—
“सर, ये इतने पुराने होने पर भी टूटे क्यों नहीं?”
प्रधानाध्यापक मुस्कुराए—
“क्योंकि मजबूत नींव और अच्छी सोच कभी नहीं टूटती।”
पुस्तकों से परे शिक्षा—प्रधानाध्यापक जयवीर सिंह का दृष्टिकोण
जयवीर सिंह सिकरवार ने पूरा भ्रमण खुद गाइड की तरह बच्चों को समझाते हुए करवाया।
उनकी हर बात में एक शिक्षक का समर्पण और एक अभिभावक का स्नेह महसूस हो रहा था।
उन्होंने कहा—
“शिक्षा केवल किताबों का बोझ नहीं होती।
बच्चा जब देखकर सीखता है, तो वह ज्ञान उसके मन में बुनियाद बन जाता है।”
जयवीर सिंह की यह सोच ही उन्हें बाकी शिक्षकों से अलग बनाती है।
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“मैं चाहता हूँ कोई भी बच्चा सपना देखना न छोड़े”—जयवीर सिंह सिकरवार

जयवीर सिंह, जो जुलाई 2025 में हाथरस से म्युचुअल ट्रांसफर होकर आए थे, ने बहुत कम समय में ही गाँव की शिक्षा व्यवस्था में नई ऊर्जा भर दी है।
उन्होंने कहा—
“कई बच्चे कभी स्कूल से बाहर नहीं निकलते, इतिहास की इमारतें सिर्फ किताबों में देखते हैं।
अगर मैं यह अनुभव उन्हें न दे पाऊं, तो शिक्षक होने का मेरा कर्तव्य अधूरा रहेगा।”
गाँव के लोगों ने उनकी इस सोच को हाथों-हाथ लिया।
गाँव में लौटते ही स्वागत—“हमने आज अपने बच्चों की मुस्कान देखी”
जब बच्चे वापस लौटे, तो गाँव के लोग उन्हें स्वागत करने आए।
माएं अपने बच्चों की आँखों में खुशी देखकर भावुक हो उठीं।
गाँव वालों ने कहा—
“इतनी कम उम्र में इतना बड़ा अनुभव… यह हम खुद भी नहीं देख पाए थे।”
सबने जयवीर सिंह के प्रति आभार व्यक्त किया और कहा कि—
“ऐसे शिक्षक बहुत कम मिलते हैं जो बच्चों को अपना मानकर सोचते हैं।”
शिक्षकों और अभिभावकों की टीम—भ्रमण को बनाया सुरक्षित और यादगार

इस यात्रा में शामिल रहे:
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कविता कुमारी (सहायक अध्यापिका)
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सुधा परमार
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शिक्षामित्र बादशाह
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शिक्षामित्र राजू सिकरवार
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दुष्यंत सिकरवार
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एवं कई अभिभावक
सभी ने बच्चों को संभालने, मार्गदर्शन देने और उन्हें सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यह शैक्षिक भ्रमण क्यों विशेष है? (विश्लेषण)

✔ ग्रामीण बच्चों को पहली बार विश्व धरोहर का अनुभव
✔ पुस्तकों से बाहर निकलकर वास्तविक इतिहास से जुड़ाव
✔ सांस्कृतिक विविधता और धार्मिक सौहार्द का अनुभव
✔ बच्चों में आत्मविश्वास और जिज्ञासा का विकास
✔ शिक्षक–समाज–अभिभावक के बीच सकारात्मक संबंध
✔ सरकारी विद्यालयों के प्रति बढ़ता विश्वास
यह वह शिक्षा है जिसे experiential learning कहा जाता है—
सीखना, देखना, महसूस करना, समझना…
यही आज के समय की सबसे प्रगतिशील शिक्षा है।
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