डायट आगरा में क्रियात्मक अनुसंधान कार्यशाला का आयोजन, भावी शिक्षकों को शोध आधारित शिक्षण की दी गई विशेष प्रशिक्षण
“अच्छा शिक्षक वही है जो समस्या की पहचान कर उसका समाधान खोज सके” — अनिरुद्ध यादव
एस. शेरवानी (ब्यूरो चीफ़)
आगरा। 06-06-2026
शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता सुधार, नवाचार और समस्याओं के प्रभावी समाधान की दिशा में जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट) आगरा द्वारा एक महत्वपूर्ण पहल की गई। डायट आगरा में प्राचार्य अनिरुद्ध यादव के निर्देशन तथा दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट (डीईआई), आगरा के सहयोग से एक दिवसीय क्रियात्मक अनुसंधान (Action Research) कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला का उद्देश्य भावी शिक्षक प्रशिक्षुओं को शोध आधारित शिक्षण, समस्या समाधान कौशल तथा विद्यालयी परिवेश में आने वाली चुनौतियों के वैज्ञानिक समाधान खोजने के लिए तैयार करना था।
कार्यशाला में डीएलएड प्रशिक्षुओं को यह समझाया गया कि एक सफल शिक्षक केवल पाठ पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह एक शोधकर्ता भी होता है, जो विद्यार्थियों, विद्यालय और शिक्षण प्रक्रिया में आने वाली समस्याओं को पहचानकर उनके समाधान खोजने का प्रयास करता है।
शिक्षा में शोध की भूमिका पर दिया गया विशेष जोर

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उप शिक्षा निदेशक एवं प्राचार्य डायट आगरा अनिरुद्ध यादव ने कहा कि वर्तमान समय में शिक्षा व्यवस्था लगातार बदल रही है और शिक्षकों को भी समय के साथ अपनी कार्यशैली में नवाचार लाना होगा।
उन्होंने कहा कि किसी भी समस्या के समाधान की शुरुआत उसके सही अवलोकन से होती है। यदि शिक्षक कक्षा में बच्चों की सीखने की कठिनाइयों, व्यवहार संबंधी चुनौतियों या शिक्षण प्रक्रिया की कमियों का सही ढंग से अवलोकन करे, तो वह उनके समाधान के लिए प्रभावी रणनीति विकसित कर सकता है।
उन्होंने प्रशिक्षुओं से कहा—
“एक अच्छा शिक्षक वही होता है जो समस्याओं को केवल देखता नहीं, बल्कि उनके समाधान खोजने की दिशा में कार्य भी करता है। क्रियात्मक अनुसंधान शिक्षकों को यही क्षमता प्रदान करता है।”
उन्होंने प्रशिक्षुओं को विद्यालयों में वास्तविक समस्याओं की पहचान करने और उनके समाधान के लिए शोध आधारित दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित किया।
प्रशिक्षुओं ने चुनी विद्यालयों की वास्तविक समस्याएं

कार्यशाला की संयोजिका डॉ. प्रज्ञा शर्मा एवं लक्ष्मी शर्मा द्वारा कार्यशाला की शुरुआत प्रशिक्षुओं के साथ संवादात्मक गतिविधियों से की गई।
सर्वप्रथम प्रशिक्षुओं से विद्यालयों में आने वाली विभिन्न समस्याओं की पहचान कराई गई। इसमें बच्चों की कम उपस्थिति, सीखने में कठिनाई, भाषा विकास, गणितीय अवधारणाओं की समझ, अनुशासन संबंधी चुनौतियां, अभिभावकों की सहभागिता और विद्यालयी वातावरण से जुड़ी समस्याओं पर चर्चा की गई।
प्रशिक्षुओं को बताया गया कि क्रियात्मक अनुसंधान की शुरुआत सही समस्या चयन से होती है। यदि समस्या स्पष्ट और वास्तविक होगी, तभी उसके समाधान की दिशा में प्रभावी कार्य किया जा सकता है।
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प्रो. एन.पी. चंदेल ने समझाया क्रियात्मक शोध का महत्व

कार्यशाला के प्रथम तकनीकी सत्र का संचालन प्रो. एन.पी. चंदेल, डीन शिक्षाशास्त्र, दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट द्वारा किया गया।
उन्होंने क्रियात्मक शोध को एक सतत, गतिशील और विकासोन्मुख प्रक्रिया बताते हुए कहा कि यह केवल शोध पत्र तैयार करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शिक्षण प्रक्रिया को बेहतर बनाने का व्यावहारिक माध्यम है।
उन्होंने बताया कि क्रियात्मक शोध चार प्रमुख चरणों पर आधारित होता है—
- योजना (Planning)
- क्रिया (Action)
- अवलोकन (Observation)
- प्रतिक्रिया (Reflection)
उन्होंने उदाहरणों के माध्यम से बताया कि किस प्रकार शिक्षक अपनी कक्षा में आने वाली समस्याओं की पहचान कर इन चार चरणों का पालन करते हुए समाधान विकसित कर सकता है।
समस्याओं के चयन और समाधान पर मिला व्यवहारिक प्रशिक्षण
प्रो. चंदेल ने प्रशिक्षुओं को शोध एवं क्रियात्मक अनुसंधान के बीच का अंतर भी समझाया। उन्होंने बताया कि सामान्य शोध व्यापक स्तर पर किया जाता है जबकि क्रियात्मक शोध स्थानीय स्तर पर तत्काल समस्या समाधान के उद्देश्य से किया जाता है।
उन्होंने प्रशिक्षुओं को यह भी बताया कि—
- समस्या का चयन कैसे करें
- शोध प्रश्न कैसे तैयार करें
- आंकड़ों का संग्रहण कैसे करें
- परिणामों का विश्लेषण कैसे करें
- संभावित समाधान कैसे विकसित करें
उन्होंने कहा कि किसी भी शोध की सफलता उसकी विश्वसनीयता, स्पष्टता और व्यवहारिक उपयोगिता पर निर्भर करती है।
विद्यालयी समस्याओं के समाधान पर केंद्रित रहा दूसरा सत्र
कार्यशाला के दूसरे सत्र का संचालन अंजना वर्मा, असिस्टेंट प्रोफेसर, दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट द्वारा किया गया।
उन्होंने विद्यालयी परिवेश, कक्षा प्रबंधन, बच्चों की सीखने की समस्याओं और शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया से संबंधित अनेक वास्तविक उदाहरणों के माध्यम से प्रशिक्षुओं को क्रियात्मक अनुसंधान की उपयोगिता समझाई।
उन्होंने बताया कि अक्सर विद्यालयों में छोटी-छोटी समस्याएं समय के साथ बड़ी चुनौतियों का रूप ले लेती हैं। यदि शिक्षक समय रहते उन समस्याओं पर शोध आधारित कार्य करें तो बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।
अंजना वर्मा ने प्रशिक्षुओं को विभिन्न समूहों में विभाजित कर विद्यालय आधारित समस्याओं पर कार्य कराया और उनसे संभावित समाधान तैयार करवाए। इस गतिविधि से प्रशिक्षुओं की व्यवहारिक समझ विकसित हुई और उन्होंने शोध प्रक्रिया को वास्तविक जीवन की परिस्थितियों से जोड़कर समझा।
भविष्य के शिक्षकों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है क्रियात्मक अनुसंधान?
विशेषज्ञों ने बताया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत शिक्षकों को केवल ज्ञान प्रदान करने वाला नहीं बल्कि नवाचारी और शोध आधारित दृष्टिकोण रखने वाला पेशेवर शिक्षक बनने की आवश्यकता है।
क्रियात्मक अनुसंधान के माध्यम से शिक्षक—
- कक्षा की समस्याओं का समाधान खोज सकते हैं
- बच्चों की सीखने की क्षमता बढ़ा सकते हैं
- शिक्षण विधियों में सुधार कर सकते हैं
- विद्यालयी वातावरण को बेहतर बना सकते हैं
- शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार ला सकते हैं
तृतीय सेमेस्टर में क्रियात्मक अनुसंधान की भूमिका पर चर्चा
कार्यक्रम का संचालन करते हुए डॉ. मनोज कुमार वार्ष्णेय ने डीएलएड पाठ्यक्रम में तृतीय सेमेस्टर के अंतर्गत क्रियात्मक अनुसंधान की अनिवार्यता पर प्रकाश डाला।
उन्होंने बताया कि यह विषय केवल परीक्षा के लिए नहीं है, बल्कि भविष्य में शिक्षक बनने वाले प्रशिक्षुओं को शोध की सोच विकसित करने का अवसर प्रदान करता है।
उन्होंने कहा कि क्रियात्मक अनुसंधान शिक्षकों को समस्याओं के प्रति संवेदनशील बनाता है और उन्हें समाधान खोजने की वैज्ञानिक दृष्टि प्रदान करता है।
बड़ी संख्या में शिक्षक और प्रशिक्षु रहे उपस्थित
कार्यशाला में प्रवक्ता अनिल कुमार, यशवीर सिंह, रंजना पांडे, कल्पना सिन्हा, धर्मेंद्र प्रसाद गौतम, यशपाल सिंह, हिमांशु सिंह, पुष्पेंद्र सिंह, अबु मुहम्मद आसिफ, संजीव कुमार सत्यार्थी तथा डॉ. दिलीप कुमार गुप्ता सहित बड़ी संख्या में शिक्षक एवं प्रशिक्षु उपस्थित रहे।
शिक्षा में नवाचार की दिशा में महत्वपूर्ण पहल
डायट आगरा में आयोजित यह कार्यशाला भविष्य के शिक्षकों को शोध आधारित शिक्षण और समस्या समाधान कौशल से सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम शिक्षा व्यवस्था को अधिक प्रभावी, व्यवहारिक और गुणवत्तापूर्ण बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
क्रियात्मक अनुसंधान की यह कार्यशाला प्रशिक्षुओं को केवल शोध की तकनीक नहीं सिखा रही, बल्कि उन्हें एक संवेदनशील, जागरूक और समाधान केंद्रित शिक्षक बनने की दिशा में प्रेरित भी कर रही है।


