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    Home - आगरा - Agra Breaking: डायट आगरा की आर्ट इंटीग्रेशन कार्यशाला में नाटक आधारित शिक्षण पर जोर, अनिरुद्ध यादव बोले- नाटक जीवन का सजीव चित्रण
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    Agra Breaking: डायट आगरा की आर्ट इंटीग्रेशन कार्यशाला में नाटक आधारित शिक्षण पर जोर, अनिरुद्ध यादव बोले- नाटक जीवन का सजीव चित्रण

    Saleem SherwaniBy Saleem SherwaniJune 3, 2026115 Views
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    मानव जीवन और भावनाओं का सजीव चित्रण है नाटक : अनिरुद्ध यादव

    डायट आगरा की आर्ट इंटीग्रेशन कार्यशाला में नाटक, अभिनय और रंगमंच के माध्यम से शिक्षण को प्रभावी बनाने की दी गई विशेष ट्रेनिंग

    Saleem Sherwani

    एस. शेरवानी (ब्यूरो चीफ़)

    आगरा। 03-06-2026

    आगरा। शिक्षा को केवल पुस्तकों और पाठ्यक्रमों तक सीमित न रखते हुए उसे अनुभवात्मक, रचनात्मक और विद्यार्थियों के लिए आनंददायक बनाने की दिशा में जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट) आगरा लगातार अभिनव प्रयास कर रहा है। इसी क्रम में डायट आगरा में आयोजित तीन दिवसीय “आर्ट इंटीग्रेशन इन टीचिंग एंड लर्निंग” कार्यशाला के दूसरे दिन नाटक, अभिनय, रंगमंच और कहानी प्रस्तुतीकरण पर आधारित विशेष प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए गए।

    कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य भावी शिक्षकों को ऐसी शिक्षण तकनीकों से परिचित कराना है, जिनके माध्यम से कक्षा शिक्षण को अधिक प्रभावी, रोचक और विद्यार्थी-केंद्रित बनाया जा सके। कार्यक्रम में प्रशिक्षुओं को बताया गया कि नाटक केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह शिक्षण का एक अत्यंत प्रभावशाली उपकरण भी है, जो बच्चों की रचनात्मकता, अभिव्यक्ति क्षमता और सीखने की रुचि को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

    नाटक समाज, जीवन और भावनाओं का जीवंत दस्तावेज

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    कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उप शिक्षा निदेशक एवं प्राचार्य डायट आगरा अनिरुद्ध यादव ने कहा कि नाटक मानव जीवन का सबसे प्रभावशाली प्रतिबिंब है। इसमें समाज, संस्कृति, नैतिक मूल्य, संघर्ष, संवेदनाएं और मानवीय भावनाओं का जीवंत चित्रण देखने को मिलता है।

    उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में शिक्षा को केवल परीक्षा तक सीमित नहीं रखा जा सकता। बच्चों को विषयों से जोड़ने और उन्हें सीखने के लिए प्रेरित करने के लिए शिक्षकों को कला आधारित शिक्षण पद्धतियों को अपनाना होगा।

    उन्होंने कहा—

    “यदि शिक्षक नाटक, अभिनय, संगीत और अन्य कलात्मक विधाओं का समुचित उपयोग करें तो बच्चे विषयों को केवल याद नहीं करेंगे, बल्कि उन्हें समझेंगे और अपने जीवन में लागू भी कर सकेंगे।”

    उन्होंने प्रशिक्षुओं से आग्रह किया कि कार्यशाला में प्राप्त अनुभवों को विद्यालयों में लागू करें ताकि शिक्षण अधिक सहभागितापूर्ण और प्रभावी बन सके।

    रंगमंच कलाकार चंद्रशेखर बहावर ने सिखाई अभिनय की बारीकियां

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    कार्यशाला के प्रथम सत्र का संचालन प्रसिद्ध रंगमंच कलाकार चंद्रशेखर बहावर ने किया। उन्होंने प्रशिक्षुओं को नाटक कला की मूल अवधारणा, अभिनय की विभिन्न विधाओं और रंगमंच की बारीकियों से अवगत कराया।

    उन्होंने आंगिक अभिनय (शारीरिक हाव-भाव) और वाचिक अभिनय (संवाद एवं आवाज़ की अभिव्यक्ति) के महत्व को विस्तार से समझाया। उन्होंने बताया कि किसी भी प्रस्तुति को प्रभावशाली बनाने के लिए संवादों का सही उच्चारण, आवाज़ में उतार-चढ़ाव, चेहरे के भाव और शारीरिक अभिव्यक्ति अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

    उन्होंने कहा कि एक सफल शिक्षक को भी एक कुशल अभिनेता की तरह होना चाहिए, क्योंकि शिक्षक प्रतिदिन कक्षा रूपी मंच पर विद्यार्थियों के सामने अपनी प्रस्तुति देता है।

    शिक्षण में कहानी और संवादों की भूमिका पर विशेष जोर

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    चंद्रशेखर बहावर ने बताया कि कहानियां बच्चों के मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं। यदि शिक्षक कहानी को नाटकीय शैली में प्रस्तुत करे, पात्रों के संवादों का उपयोग करे और अभिनय के तत्वों को शामिल करे, तो विद्यार्थियों की रुचि कई गुना बढ़ जाती है।

    उन्होंने प्रशिक्षुओं को यह भी बताया कि शिक्षण में नाटक और संवादों का उपयोग करने से—

    • विद्यार्थियों की एकाग्रता बढ़ती है
    • भाषा कौशल विकसित होता है
    • आत्मविश्वास में वृद्धि होती है
    • जटिल विषयों को समझना आसान हो जाता है
    • टीमवर्क और नेतृत्व क्षमता विकसित होती है

    ‘पंच परमेश्वर’ के मंचन ने बनाया माहौल जीवंत

    कार्यशाला के दौरान प्रसिद्ध साहित्यकार प्रेमचंद की कहानी ‘पंच परमेश्वर’ का नाटकीय मंचन कराया गया। प्रशिक्षुओं ने पात्रों की भूमिका निभाते हुए कहानी को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया।

    संवादों, भाव-भंगिमाओं और अभिनय की उत्कृष्ट प्रस्तुति ने पूरे सभागार को रोमांचित कर दिया। इस गतिविधि के माध्यम से प्रशिक्षुओं ने अनुभव किया कि साहित्यिक रचनाओं को अभिनय के जरिए पढ़ाने से बच्चों की समझ और रुचि दोनों में वृद्धि होती है।

    नौ समूहों ने प्रस्तुत किए प्रेरक नाटक

    द्वितीय सत्र में कार्यक्रम संयोजिका डॉ. प्रज्ञा शर्मा द्वारा सभी प्रशिक्षुओं को नौ समूहों में विभाजित किया गया। प्रत्येक समूह को अलग-अलग विषयों और कहानियों पर आधारित नाट्य प्रस्तुति तैयार करने का कार्य दिया गया।

    समूहों को आर्ट सर्कल, क्रिएटिव सोल, धमाका, वसुंधरा, कला के दीवाने, क्रिएटिव फ्रेंड्स, न्यू टैलेंट आदि नाम दिए गए।

    प्रशिक्षुओं ने समूहों में कार्य करते हुए पात्र चयन, संवाद लेखन, मंचीय प्रस्तुति और अभिनय का अभ्यास किया। इस दौरान प्रशिक्षकों ने संवादों के उच्चारण, भावों की अभिव्यक्ति और मंच संचालन से संबंधित सुझाव भी दिए।

    ‘श्रवण कुमार’ और ‘नमक का दरोगा’ ने जीती सभी की सराहना

    कार्यशाला में प्रस्तुत विभिन्न नाटकों में वसुंधरा समूह द्वारा प्रस्तुत श्रवण कुमार की कहानी और क्रिएटिव सोल समूह द्वारा प्रस्तुत नमक का दरोगा विशेष आकर्षण का केंद्र रहे।

    दोनों प्रस्तुतियों में प्रशिक्षुओं ने उत्कृष्ट अभिनय, प्रभावशाली संवाद अदायगी और भावनात्मक प्रस्तुति के माध्यम से दर्शकों का दिल जीत लिया। इन प्रस्तुतियों ने यह सिद्ध किया कि कला और साहित्य का समन्वय शिक्षा को अधिक प्रभावी बना सकता है।

    कला आधारित शिक्षण से विकसित होंगे 21वीं सदी के कौशल

    कार्यशाला में विशेषज्ञों ने बताया कि कला समेकित शिक्षण (Art Integrated Learning) राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की महत्वपूर्ण अवधारणाओं में से एक है।

    इस प्रकार के शिक्षण से विद्यार्थियों में निम्नलिखित कौशल विकसित होते हैं—

    • रचनात्मक सोच
    • आलोचनात्मक चिंतन
    • समस्या समाधान क्षमता
    • संचार कौशल
    • सहयोग और नेतृत्व क्षमता
    • आत्मविश्वास और प्रस्तुतीकरण कौशल

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में कला आधारित शिक्षण विद्यार्थियों के समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

    प्रशिक्षुओं ने दिखाया उत्साह, सीखी नई शिक्षण तकनीकें

    कार्यशाला में भाग लेने वाले प्रशिक्षुओं ने बताया कि इस प्रशिक्षण से उन्हें शिक्षण के नए आयामों को समझने का अवसर मिला। उन्होंने कहा कि भविष्य में वे इन तकनीकों का उपयोग अपने विद्यालयों में करेंगे ताकि बच्चों के लिए शिक्षा अधिक रोचक और प्रभावशाली बन सके।

    कार्यक्रम में रही गरिमामयी उपस्थिति

    कार्यक्रम का संचालन लक्ष्मी शर्मा द्वारा किया गया। इस अवसर पर डॉ. प्रज्ञा शर्मा, डॉ. मनोज कुमार वार्ष्णेय, डॉ. दिलीप कुमार गुप्ता, पुष्पेंद्र सिंह, संजीव कुमार सत्यार्थी, यशवीर सिंह, अनिल कुमार, हिमांशु सिंह, अबू मोहम्मद आसिफ, धर्मेंद्र प्रसाद गौतम, रंजना पांडे सहित संस्थान के अनेक प्रवक्ता एवं प्रशिक्षु उपस्थित रहे।

    शिक्षा और कला का संगम बनेगा भविष्य की सीखने की नई दिशा

    कार्यशाला के दूसरे दिन का यह सत्र इस बात का प्रमाण बना कि यदि शिक्षण में कला, अभिनय और रचनात्मक गतिविधियों को शामिल किया जाए तो सीखने की प्रक्रिया अधिक प्रभावशाली और आनंददायक बन सकती है।

    डायट आगरा द्वारा आयोजित यह कार्यशाला भावी शिक्षकों को केवल पाठ पढ़ाने की नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के भीतर सीखने की जिज्ञासा जगाने की कला भी सिखा रही है। यही प्रयास भविष्य में शिक्षा को अधिक जीवंत, संवेदनशील और प्रभावी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

     

     

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