
टीईटी अनिवार्यता के खिलाफ देशभर के शिक्षकों का जंतर-मंतर पर विस्फोट—20 राज्यों के शिक्षक दिल्ली की सड़कों पर उतरे, चार सूत्रीय मांगों पर सरकार से टकराव तेज
एस. शेरवानी (ब्यूरो चीफ़)
दिल्ली/आगरा। 11 दिसंबर 2025
देश के शिक्षकों का धैर्य अब टूट चुका है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सेवाकालीन शिक्षकों पर टीईटी (Teacher Eligibility Test) अनिवार्य किए जाने के आदेश के बाद देशभर में असंतोष का ज्वार फूट पड़ा है। इसका सबसे बड़ा दृश्य आज जंतर-मंतर पर देखने को मिला, जब 20 राज्यों के हजारों शिक्षकों का जनसैलाब राजधानी की सड़कों पर उमड़ पड़ा।
सुबह 10 बजे से शुरू हुआ यह धरना महज़ विरोध नहीं, बल्कि “शिक्षक अस्मिता बचाओ महाआंदोलन” बनकर उभरा। हाथों में तख्तियाँ, नारों की गूँज, और हर राज्य से आए समूहों के जोशीले स्वर यह बता रहे थे कि यह सिर्फ एक मांग नहीं—बल्कि शिक्षा व्यवस्था के भविष्य की लड़ाई है।
धरना स्थल का माहौल—हजारों शिक्षकों के नारे से हिला जंतर-मंतर
जंतर-मंतर पर माहौल किसी आंदोलन के ऐतिहासिक क्षण जैसा दिखा—
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“सेवाकालीन टीईटी वापस लो!”
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“शिक्षक सम्मान नहीं, अपमान—हम नहीं सहेंगे!”
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“योग्यता पर सवाल नहीं, व्यवस्था पर सवाल है!”
ऐसे बुलंद नारों से पूरा क्षेत्र गूंज उठा। प्रदर्शन में महिलाएं, युवा शिक्षक, वरिष्ठ शिक्षक—सभी shoulder-to-shoulder दिखे।
राष्ट्रीय अध्यक्ष सुशील पाण्डेय का तीखा बयान—“सेवाकालीन टीईटी थोपना शिक्षकों पर मानसिक हमला”
धरना प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुशील पाण्डेय ने कहा—
“यह फैसला तानाशाही है। 20-25 वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षक अचानक अयोग्य नहीं हो जाते। टीईटी लागू करने से न शिक्षा बेहतर होगी और न व्यवस्था पारदर्शी बनेगी—यह सिर्फ दबाव, अपमान और अविश्वास पैदा करेगा।”
उन्होंने सरकार से तुरंत अध्यादेश लाकर इस आदेश को रद्द करने की मांग की।
ऑल इंडिया टीचर्स कम्युनिटी का बड़ा समर्थन—OPS नेता शिवगोपाल मिश्रा भी मंच पर आए
पुरानी पेंशन बहाली आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक शिवगोपाल मिश्रा ने शिक्षकों के संघर्ष को खुला समर्थन दिया।
उन्होंने कहा—
“टीईटी सेवाकाल में लागू करना अनैतिक है। सरकार शिक्षकों की रीढ़ तोड़ने की कोशिश कर रही है, जिसे हम स्वीकार नहीं करेंगे।”
उनके समर्थन से आंदोलन को राष्ट्रव्यापी ताकत मिली।
चार सूत्रीय मांगें — जिन पर शिक्षक पीछे हटने को तैयार नहीं

धरने में चार प्रमुख मांगें सर्वसम्मति से रखी गईं:
1. सेवाकालीन टीईटी को पूरी तरह वापस लिया जाए
यह सबसे बड़ी मांग है जिसे शिक्षक “अपमानजनक” और “व्यवहारिक रूप से असंभव” बता रहे हैं।
2. शिक्षकों के लिए योग्यता सुधार पर स्वतंत्र आयोग का गठन
जिसमें शिक्षकों की राय, वास्तविक जमीनी परिस्थितियों और शिक्षा मनोविज्ञान को ध्यान में रखा जाए।
3. शिक्षकों की सेवा-शर्तों में होने वाले बदलाव पर पूर्व संवाद अनिवार्य हो
ताकि नियम बिना सहमति बदले न जा सकें।
4. शिक्षकों पर मानसिक व प्रशासनिक दबाव डालने वाली नीतियों को खत्म किया जाए
क्योंकि शिक्षकों का समय छात्रों के लिए होना चाहिए, कागजों के लिए नहीं।
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राष्ट्रीय काउंसलर बृजेश दीक्षित ने चेताया—“25 लाख शिक्षकों का भविष्य संकट में है”
बृजेश दीक्षित ने कहा—
“सरकार संसद में तुरंत अध्यादेश लाए। हम चुप नहीं बैठेंगे। यह लड़ाई शिक्षक अस्तित्व की लड़ाई है।”
उन्होंने बताया कि देश के दूर-दराज़ क्षेत्रों से शिक्षक निजी खर्च पर दिल्ली पहुँचे—यह दिखाता है कि मामला कितना गंभीर है।
आगरा से शिक्षकों की सबसे बड़ी टीम—40+ प्रतिनिधि पहुंचे दिल्ली

आगरा से आया समूह सबसे अनुशासित और सक्रिय टीमों में से एक रहा। शामिल प्रमुख नाम—
ओमवीर सिंह डागुर, सूरज शर्मा, विकास चतुर्वेदी, राजेंद्र त्यागी, रंजीत सिंह चाहर, प्रमोद राजपूत, समुद्र सिंह, दिनेश शर्मा, शिव सिंह, राघवेन्द्र सिंह, संजीव धाकरे, कृष्ण गोपाल उपाध्याय, सुनील कटारा, पुनीत गोयल, लक्ष्मीनारायण गोयल, दिनेश शर्मा, मनमोहन सोलंकी, नेत्रपाल चाहर, प्रभात मंगल, अजय सिकरवार, हरेंद्र वर्मा, प्रदीप चौधरी, निज़ामुद्दीन, मोहम्मद अज़ीम, अतीकुर्रहमान, मुदित चौधरी, अनुज शर्मा, संदीप परिहार, अनिल धाकरे, राहुल कौशिक, शशांक भारद्वाज, भगवती प्रसाद खंडेलवाल, प्रशांत नौहवार, विजय सिकरवार, कामता प्रसाद, आशुतोष विक्रम आदि।
उनकी उपस्थिति ने आगरा को प्रदर्शन में प्रमुख स्थान दिलाया।
धरने का असर—शिक्षकों ने चेतावनी दी, जल्द नहीं मानी गई मांगें तो आंदोलन और बड़ा होगा
धरने के अंत में नेताओं ने साफ कहा—
“यह सिर्फ शुरुआत है। अगर मांगें नहीं मानी गईं तो पूरे देश में एक चरणबद्ध महाआंदोलन होगा।”
उन्होंने बताया कि अगले चरण में—
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प्रदेश स्तरीय धरने
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संसद घेराव
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राष्ट्रव्यापी स्कूल बंद
जैसे कार्यक्रम भी प्रस्तावित हैं।
समापन—‘यह सिर्फ विरोध नहीं, शिक्षा बचाने की राष्ट्रीय लड़ाई है’
धरने में शामिल शिक्षकों ने कहा कि यह आंदोलन किसी राजनीतिक विरोध का हिस्सा नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता और शिक्षक सम्मान की रक्षा की लड़ाई है।
जंतर-मंतर पर आज जो ऊर्जा दिखी, उससे स्पष्ट है—
देश का शिक्षक अब जाग चुका है, और संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक सेवाकालीन टीईटी को पूरी तरह वापस नहीं लिया जाता।
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