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डायट आगरा में पहली संगीत कार्यशाला का सफल समापन | गायन, वादन और नृत्य से प्रशिक्षुओं ने दिखाया हुनर

डायट आगरा में दो दिवसीय प्रथम संगीत कार्यशाला का सफल समापन हुआ। प्रशिक्षुओं ने गायन, वादन और नृत्य में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। कार्यशाला का उद्देश्य शिक्षण में संगीत को प्रभावी साधन बनाना था।

डायट आगरा में पहली संगीत कार्यशाला का हुआ भव्य समापन

 

आगरा, 02 सितम्बर 2025।

ब्यूरो रिपोर्ट (एस. शेरवानी)

आगरा शहर का जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (DIET) हमेशा से ही शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार और रचनात्मकता के लिए जाना जाता है। इसी कड़ी में संस्थान ने प्रशिक्षु शिक्षकों के लिए एक अनोखी पहल की। 01 और 02 सितम्बर 2025 को दो दिवसीय संगीत विषयक कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिसका उद्देश्य था – प्रशिक्षुओं को न केवल संगीत की मूलभूत शिक्षा देना बल्कि उन्हें यह भी समझाना कि संगीत शिक्षण प्रक्रिया में कितना प्रभावी और प्रेरणादायी माध्यम बन सकता है।

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कार्यशाला का महत्व

संगीत शिक्षा केवल सुर, ताल और लय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्तित्व विकास, संवेदनशीलता और संतुलित सोच को भी बढ़ावा देती है।

  • गायन आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम है,

  • वादन अनुशासन और धैर्य की साधना है,

  • नृत्य संगीत की जीवंत अभिव्यक्ति है।

इन तीनों विधाओं का संगम शिक्षा को और भी अधिक रोचक, सृजनात्मक और प्रभावशाली बनाता है।

प्रशिक्षुओं की प्रस्तुतियाँ

कार्यशाला के समापन दिवस पर प्रशिक्षुओं ने गायन, वादन और नृत्य के माध्यम से अपने दो दिनों में अर्जित ज्ञान का प्रदर्शन किया।

  • कुछ ने लोकगीत और भजन प्रस्तुत कर सबका मन मोह लिया।

  • वादन विद्या में प्रशिक्षुओं ने हारमोनियम, तबला और ढोलक पर बेहतरीन ताल-लय का प्रदर्शन किया।

  • वहीं नृत्य विद्या में प्रशिक्षुओं ने शास्त्रीय एवं लोकनृत्य की झलक पेश कर सबको मंत्रमुग्ध कर दिया।

इन प्रस्तुतियों से यह स्पष्ट हुआ कि प्रशिक्षुओं ने संगीत को केवल एक कला के रूप में नहीं, बल्कि शिक्षण की नई दिशा के रूप में अपनाया है।

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प्राचार्य का संबोधन

समापन सत्र की अध्यक्षता संस्थान की उप शिक्षा निदेशक एवं प्राचार्य श्रीमती पुष्पा कुमारी ने की। उन्होंने कहा –

“संगीत हृदय को संवेदनशील बनाता है और शिक्षक के व्यक्तित्व में संतुलन लाता है। जब प्रशिक्षु शिक्षक संगीत जैसे रचनात्मक साधन को अपने शिक्षण में अपनाते हैं, तो वे विद्यार्थियों को केवल पढ़ाते ही नहीं, बल्कि उन्हें जीवन जीने की कला भी सिखाते हैं।”

विशेषज्ञों की राय

कार्यशाला में अलग-अलग विशेषज्ञों ने संगीत की विभिन्न विधाओं को सरल और रोचक ढंग से प्रशिक्षुओं को सिखाया।

  • डॉ. डी.के. गुप्ता (प्रवक्ता, डायट आगरा, कार्यशाला प्रभारी)

    “प्रशिक्षुओं ने दो दिनों में संगीत की बुनियादी और तकनीकी जानकारी सीखी। अब वे इसे कक्षा में प्रयोग कर विद्यार्थियों की सीखने की रुचि और रचनात्मकता को बढ़ा सकते हैं।”

  • डॉ. अनुराग शर्मा (वादन विद्या विशेषज्ञ)

    “वाद्य संगीत धैर्य और अनुशासन का आधार है। ताल और लय का अभ्यास करके प्रशिक्षुओं ने सीखा कि संगीत मानसिक एकाग्रता का सबसे प्रभावी साधन है।”

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  • मनोज कुमार उपाध्याय (गायन विद्या विशेषज्ञ)

    “गायन आत्मा की अभिव्यक्ति है। जब स्वर और भाव मिलते हैं तो आत्मविश्वास और अभिव्यक्ति शक्ति दोनों का विकास होता है।”

  • श्रीमती रितु गर्ग (नृत्य विद्या विशेषज्ञ)

    “नृत्य शिक्षा को रोचक और जीवंत बनाने का साधन है। गति और ताल के माध्यम से प्रशिक्षुओं ने अनुभव किया कि सीखना केवल किताबों तक सीमित नहीं है।”

सम्मान और आभार

कार्यशाला के समापन अवसर पर तीनों प्रशिक्षकों को डायट आगरा की ओर से प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। प्रशिक्षुओं ने सामूहिक सांगीतिक प्रस्तुति देकर इस आयोजन को यादगार बना दिया।

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प्रतिभागियों की मौजूदगी

कार्यशाला में प्रवक्ता अनिल कुमार, डॉ. मनोज वार्ष्णेय, पुष्पेंद्र सिंह, यशवीर सिंह, हिमांशु सिंह, यशपाल सिंह, संजीव सत्यार्थी, अबू मोहम्मद आसिफ, डॉ. प्रज्ञा शर्मा, लक्ष्मी शर्मा, कल्पना सिन्हा, रंजना पांडे सहित दर्जनों प्रशिक्षु उपस्थित रहे।

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शिक्षा में संगीत का बढ़ता महत्व

आज के समय में शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रही। जब शिक्षा में संगीत, कला और सृजनात्मक गतिविधियाँ शामिल होती हैं, तो विद्यार्थियों में सीखने की रुचि स्वतः बढ़ जाती है।

  • संगीत तनाव को कम करता है।

  • यह टीचिंग-लर्निंग प्रोसेस को रोचक और प्रभावशाली बनाता है।

  • बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास में संगीत की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

डायट आगरा द्वारा इस कार्यशाला का आयोजन इस बात का प्रमाण है कि भविष्य के शिक्षक केवल पढ़ाने वाले नहीं, बल्कि प्रेरणा देने वाले गुरु बनेंगे।

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निष्कर्ष

डायट आगरा में आयोजित प्रथम संगीत कार्यशाला न केवल प्रशिक्षुओं के लिए यादगार अनुभव रही, बल्कि इसने यह संदेश भी दिया कि शिक्षा का भविष्य सृजनात्मकता, संवेदनशीलता और कलात्मक दृष्टिकोण से ही सुरक्षित है।

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