चंबल सेंचुरी सीमा निर्धारण पर मिले सांसद व मंत्री
सांसद राजकुमार चाहर ने पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव से चंबल सेंचुरी सीमा निर्धारण पर मुलाकात कर बाह क्षेत्र की जनता को राहत का भरोसा दिलाया।
चंबल सेंचुरी सीमा निर्धारण पर हुई अहम चर्चा, सांसद राजकुमार चाहर ने उठाई बाह क्षेत्र की आवाज
एस. शेरवानी (ब्यूरो चीफ़) –
आगरा। बाह क्षेत्र की जनता लंबे समय से चंबल सेंचुरी की सीमा निर्धारण को लेकर परेशान रही है। खेती-बाड़ी, विकास कार्य और सामान्य जीवन पर पड़ रहे प्रभाव को देखते हुए फतेहपुर सीकरी सांसद राजकुमार चाहर ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से उठाया। इसी क्रम में सांसद ने हाल ही में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव से मुलाकात की और क्षेत्र की समस्याओं को विस्तार से रखा।
इस मुलाकात में सांसद ने मांग की कि चंबल सेंचुरी की सीमा को 500 मीटर तक सीमित किया जाए, ताकि क्षेत्र की जनता को राहत मिल सके।
चंबल सेंचुरी और क्षेत्र की समस्याएं
चंबल सेंचुरी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमाओं पर फैला हुआ एक महत्वपूर्ण वन्यजीव संरक्षण क्षेत्र है। यहां घड़ियाल, मगरमच्छ, कछुए और कई दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं।
लेकिन समस्या यह है कि सीमा निर्धारण की अस्पष्टता और अति-विस्तार के कारण बाह क्षेत्र की जनता को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
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किसानों की ज़मीनें विकास कार्यों के लिए अधर में लटक गई हैं।
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मकान बनाने और मरम्मत कराने तक में बाधाएं आ रही हैं।
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सड़क, स्कूल, अस्पताल जैसे विकास कार्य रुक रहे हैं।
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स्थानीय लोग हमेशा वन विभाग और प्रशासनिक नियमों के डर में जी रहे हैं।
इसी कारण वर्षों से यहां की जनता चंबल सेंचुरी सीमा निर्धारण को लेकर आंदोलनरत रही है।
सांसद राजकुमार चाहर की पहल
सांसद राजकुमार चाहर ने इस बैठक में कहा कि वह इस मुद्दे को जनता की प्राथमिकता मानते हैं। उन्होंने कहा:
“बाह क्षेत्र की जनता का जीवन सीधे-सीधे प्रभावित हो रहा है। खेती और आवास जैसी मूलभूत ज़रूरतें अधूरी नहीं रह सकतीं। इसलिए चंबल सेंचुरी की सीमा को 500 मीटर तक निर्धारित किया जाना आवश्यक है।”
सांसद ने मंत्री के सामने क्षेत्रीय जनता की भावनाओं और सुझावों को भी रखा।
पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव का रुख
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने सांसद की बातों को गंभीरता से सुना और अधिकारियों से इस पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि सरकार इस मुद्दे को सकारात्मक दृष्टिकोण से देख रही है और इसका समाधान जल्द निकाला जाएगा।
मंत्री ने यह भी बताया कि इस संबंध में केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश सरकार से औपचारिक प्रस्ताव मांगा है। जैसे ही प्रस्ताव मिलेगा, इस पर त्वरित निर्णय लिया जाएगा।
क्षेत्रीय नेताओं की उपस्थिति
इस मुलाकात में बाह क्षेत्र के कई प्रमुख जनप्रतिनिधि और सामाजिक कार्यकर्ता भी मौजूद रहे। इनमें –
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पूर्व विधायक जितेंद्र वर्मा
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मधुसूदन शर्मा
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पूर्व जिलाध्यक्ष श्याम भदौरिया
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सुग्रीव चौहान
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कृष्णपाल सिंह जरार वाले
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नितिन वर्मा
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कप्तान सिंह
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मुन्ना लम्बरदार
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सतेंद्र बरुआ
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रविन्द्र बघेल
इन सबने भी एकजुट होकर जनता की समस्याओं को मंत्री तक पहुँचाया।
जनता की उम्मीदें
बाह क्षेत्र के लोगों को उम्मीद है कि इस पहल से उन्हें जल्द राहत मिलेगी। अब तक उनकी जमीनें सेंचुरी क्षेत्र में आने के कारण कानूनी उलझनों में फंसी रही हैं।
किसानों ने कहा कि अगर सीमा निर्धारण साफ-साफ तय हो जाता है, तो वे निश्चिंत होकर खेती कर पाएंगे। वहीं आम नागरिकों का कहना है कि विकास कार्यों का रुकना उनके बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।
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क्यों जरूरी है 500 मीटर सीमा निर्धारण?
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इससे किसानों की जमीन सुरक्षित रहेगी।
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घर बनाने और मरम्मत करने की अनुमति में आसानी होगी।
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सड़क, बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं क्षेत्र में आ पाएंगी।
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बाह क्षेत्र में निवेश और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।
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जनता का वन विभाग के डर से मुक्ति मिलेगी।
सांसद की प्रतिबद्धता
सांसद राजकुमार चाहर ने कहा कि उन्होंने यह मुद्दा केवल राजनीति के लिए नहीं, बल्कि जनता के वास्तविक हित में उठाया है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि वह तब तक संघर्ष करेंगे जब तक बाह क्षेत्र की जनता को इस समस्या से राहत नहीं मिल जाती।
उन्होंने कहा –
“चंबल सेंचुरी संरक्षण हमारे लिए उतना ही जरूरी है जितना कि जनता का जीवन। दोनों के बीच संतुलन बनाना ही सरकार की जिम्मेदारी है।”
आगे की प्रक्रिया
अब गेंद उत्तर प्रदेश सरकार के पाले में है। जैसे ही राज्य सरकार प्रस्ताव केंद्र को भेजेगी, इस पर निर्णय होगा। उम्मीद है कि आने वाले महीनों में इस दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे।
निष्कर्ष
चंबल सेंचुरी सीमा निर्धारण पर सांसद राजकुमार चाहर की पहल से बाह क्षेत्र की जनता को बड़ी उम्मीद बंधी है। अगर सीमा को 500 मीटर तक सीमित कर दिया जाता है, तो यह न केवल जनता को राहत देगा, बल्कि विकास कार्यों को भी नई गति मिलेगी।
पर्यावरण संरक्षण और जनता के हित के बीच संतुलन बनाते हुए यह निर्णय ऐतिहासिक साबित हो सकता है।
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