Breaking: विधान सभा निर्वाचन क्षेत्रों की निर्वाचक नामावलियों के विशेष प्रगाढ़ पुनरीक्षण की घोषणा
भारत निर्वाचन आयोग के निर्देशानुसार अर्हता तिथि 01 जनवरी 2026 के आधार पर विधान सभा निर्वाचन क्षेत्रों की निर्वाचक नामावलियों के विशेष प्रगाढ़ पुनरीक्षण की समय-सारिणी घोषित की गयी।

विधान सभा निर्वाचन क्षेत्रों की निर्वाचक नामावलियों के विशेष प्रगाढ़ पुनरीक्षण कार्यक्रम घोषित — मतदाता सूची की शुचिता, पारदर्शिता और लोकतान्त्रिक मर्यादा को सुदृढ़ करने की राष्ट्रीय प्रक्रिया आरम्भ
एस. शेरवानी (ब्यूरो चीफ़)
आगरा | 04 नवम्बर 2025
भारत का चुनाव लोकतन्त्र का सबसे मजबूत स्तंभ है और इस स्तंभ की नींव ‘‘मतदाता सूची की शुद्धता’’ से ही सुनिश्चित होती है।
इसी क्रम में भारत निर्वाचन आयोग द्वारा प्रदेश की सभी विधान सभा निर्वाचन क्षेत्रों की निर्वाचक नामावलियों का विशेष प्रगाढ़ पुनरीक्षण कार्यक्रम निर्धारित किया गया है।
अपर जिलाधिकारी (नगर) एवं उप जिला निर्वाचन अधिकारी यमुनाधर चौहान ने बताया कि यह प्रक्रिया आगामी लोकनीति, चुनावी पवित्रता और मतदाता सत्यापन की सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रक्रिया होती है, जिससे वास्तविक पात्रता वाले मतदाता ही सूची में शामिल हों और सूची त्रुटिरहित बने।
यह पुनरीक्षण क्यों महत्वपूर्ण है?
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मताधिकार लोकतंत्र का सर्वोच्च अधिकार है
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गलत नाम, मृतक नाम, डुप्लीकेशन, त्रुटियाँ — चुनावी शुचिता को प्रभावित करते हैं
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नए मतदान वयस्क युवा, स्थान परिवर्तन वाले नागरिकों को सम्मिलित करने का उचित अवसर मिलता है
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यह प्रक्रिया चुनाव में विश्वास, पारदर्शिता और निष्पक्षता का आधार तैयार करती है
यह केवल प्रशासकीय प्रक्रिया नहीं —
लोकतंत्र के आत्म सम्मान की सुरक्षा है।
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निर्धारित समय-सारिणी का गहरा महत्व
प्रत्येक चरण समयबद्ध है, ताकि नागरिकों को पर्याप्त समय मिले —
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04 नवम्बर 2025 से 04 दिसम्बर 2025 तक गणना अवधि
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09 दिसम्बर 2025 को आलेख्य प्रकाशन
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09 दिसम्बर 2025 से 08 जनवरी 2026 तक दावे / आपत्तियाँ
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31 जनवरी 2026 तक सत्यापन व निस्तारण
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07 फरवरी 2026 को अंतिम प्रकाशन
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नागरिकों की भूमिका — निष्क्रिय दर्शक नहीं, सक्रिय सहभागी
प्रशासन का मानना है कि यह जिम्मेदारी केवल सरकारी विभागों की नहीं है, बल्कि प्रत्येक पात्र नागरिक को अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।
मतदाता सूची सही होगी, तभी मतदान का अर्थ सार्थक होगा।
गलत नाम भी हटेंगे, सही नाम भी जुड़ेंगे —
और यही प्रक्रिया लोकतान्त्रिक पवित्रता की रीढ़ है।
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निष्कर्ष
यह कार्यक्रम “चुनाव की शुचिता” को औपचारिक नहीं, बल्कि “व्यवहारिक धरातल” पर स्थापित करने की सबसे निर्णायक प्रक्रिया है।
इसकी सफलता केवल चुनावी व्यवस्थाओं की नहीं,
भारत के लोकतांत्रिक चरित्र की सर्वोच्च प्रतिष्ठा की सफलता है।
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