अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर खेरागढ़ की छात्रा लक्ष्मी बनी एक दिन की प्रधानाध्यापिका — ‘बेटी ही है बदलाव की शुरुआत’

रिपोर्टर: एस. शेरवानी (ब्यूरो चीफ़)

स्थान: खेरागढ़/आगरा | तिथि: 11 अक्टूबर 2025

विश्व बालिका दिवस पर खेरागढ़ का स्कूल बना प्रेरणा का केंद्र

अक्सर कहा जाता है — “बेटी केवल एक परिवार नहीं, बल्कि पूरे समाज का भविष्य बदल सकती है।”
इस बात को खेरागढ़ ब्लॉक के प्राथमिक विद्यालय कछपुरा, सरेंडा ने हकीकत में बदल दिया।
अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस 2025 के अवसर पर इस विद्यालय ने शिक्षा और सशक्तिकरण का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया,
जो न केवल जिले बल्कि पूरे प्रदेश के लिए प्रेरणा बन गया।

इस विशेष दिन विद्यालय में उत्साह, रंगीन सजावट और खुशियों का माहौल था।
स्कूल की दीवारों पर “बेटी पढ़ेगी, देश बढ़ेगा” और “शिक्षित बेटी, सशक्त समाज की नींव” जैसे नारों से पूरा परिसर गूंज उठा।
सभी शिक्षकों और बच्चों ने मिलकर इस दिन को उत्सव के रूप में मनाया।

लक्ष्मी बनी विद्यालय की एक दिन की प्रधानाध्यापिका

कार्यक्रम का सबसे भावनात्मक क्षण तब आया जब कक्षा चार की छात्रा लक्ष्मी को विद्यालय की एक दिन की प्रधानाध्यापिका घोषित किया गया।
स्कूल के इंचार्ज प्रधानाध्यापक डॉ. सतीश कुमार ने लक्ष्मी के सिर पर दुपट्टा रखकर प्रतीकात्मक रूप से
उन्हें जिम्मेदारी सौंपी।

लक्ष्मी जब आत्मविश्वास से मंच पर पहुँची, तो तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा स्कूल गूंज उठा।
बड़े ही सहज और दृढ़ स्वर में उसने कहा —

“मैं यह साबित करना चाहती हूँ कि बेटियाँ केवल पढ़ाई में ही नहीं, नेतृत्व में भी किसी से पीछे नहीं हैं।
मैं बड़ी होकर सच में प्रधानाध्यापिका बनना चाहती हूँ, ताकि गाँव की हर बच्ची को स्कूल जाने का अवसर मिले।”

उनके इस कथन ने वहां मौजूद सभी शिक्षकों, विद्यार्थियों और अभिभावकों की आंखों में चमक ला दी।

नेतृत्व की जिम्मेदारी निभाई आत्मविश्वास के साथ

प्रधानाध्यापिका बनी लक्ष्मी ने पूरे दिन की स्कूल गतिविधियाँ संभालीं।
सुबह की प्रार्थना सभा में उसने “शिक्षा ही सबसे बड़ा धन है” विषय पर भाषण दिया,
कक्षाओं का निरीक्षण किया और उपस्थिति रजिस्टर में हस्ताक्षर किए।

उसने छात्रों से कहा —

“स्वच्छ रहना, समय पर स्कूल आना और दूसरों की मदद करना ही असली नेतृत्व है।”

शिक्षकों ने भी लक्ष्मी की इस नेतृत्व क्षमता की सराहना करते हुए कहा कि यह पहल
अन्य छात्राओं को आत्मविश्वास और जिम्मेदारी का एहसास दिलाएगी।

शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता पर विशेष कार्यक्रम

इस अवसर पर विद्यालय में विशेष रूप से ‘स्वच्छ बालिका – स्वस्थ समाज’ अभियान भी चलाया गया।
सभी छात्राओं को निःशुल्क लेखन सामग्री, कॉपी-पेन, और रुमाल भेंट किए गए।
इसका उद्देश्य था – “हर बालिका को शिक्षा का साधन और स्वच्छता का संबल देना।”

प्रधानाध्यापक डॉ. सतीश कुमार ने कहा —

“हमारा उद्देश्य केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है। हम चाहते हैं कि हर बच्ची
आत्मनिर्भर बने, अपने अधिकार पहचाने और आत्मविश्वास के साथ समाज में अपनी जगह बनाए।”

उन्होंने आगे कहा कि अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस केवल एक उत्सव नहीं,
बल्कि एक “आवाज़” है — जो समाज से कहती है कि अब बेटियाँ केवल सपने नहीं देखेंगी,
बल्कि उन्हें साकार भी करेंगी।

अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस का इतिहास और महत्व

कार्यक्रम में डॉ. कुमार ने बालिकाओं को बताया कि
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 19 दिसंबर 2011 को
11 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस (International Day of the Girl Child) घोषित किया था।

पहली बार इसे 2012 में मनाया गया।
इस दिन का मुख्य उद्देश्य दुनिया भर में बालिकाओं को
शिक्षा, समान अवसर, सुरक्षा और सशक्तिकरण के अधिकारों के प्रति जागरूक करना है।

उन्होंने कहा —

“यह दिन हमें याद दिलाता है कि हर लड़की को जीवन के हर क्षेत्र में समान अधिकार मिलना चाहिए —
चाहे वह शिक्षा हो, स्वास्थ्य, सुरक्षा या निर्णय लेने की स्वतंत्रता।”

शिक्षकों के विचार: बदलाव की शुरुआत स्कूल से

शिक्षक राकेश कुमार ने बताया कि इस दिवस की जड़ें 1995 के बीजिंग महिला सम्मेलन से जुड़ी हैं,
जहां महिलाओं ने लड़कियों के अधिकारों और उनके खिलाफ हो रहे भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई थी।
उन्होंने कहा —

“अगर किसी समाज को सशक्त बनाना है तो सबसे पहले उसकी बेटियों को शिक्षित करना जरूरी है।”

वहीं शिक्षक मोहित वर्मा ने इस वर्ष की थीम “लड़कियों का नेतृत्व और उनकी स्वतंत्र पहचान” पर प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा —

“हर लड़की में नेतृत्व की क्षमता जन्म से होती है।
जरूरत है केवल उसे पहचानने, प्रोत्साहन देने और आगे बढ़ने का अवसर देने की।”

छात्राओं की भावनाएँ: ‘अब हमें खुद पर विश्वास है’

कार्यक्रम के दौरान कई छात्राओं ने अपने विचार साझा किए।
कक्षा पाँच की छात्रा सोनम ने कहा —

“लक्ष्मी दीदी को प्रधानाध्यापिका बनते देखकर हमें भी लगा कि हम भी कुछ कर सकते हैं।”

कक्षा तीन की छात्रा रानी ने मुस्कुराते हुए कहा —

“पहले लगता था कि सिर्फ बड़े लोग ही नेता बन सकते हैं,
लेकिन आज समझ में आया कि हम भी कर सकते हैं।”

उनकी बातों से झलक रहा था कि आज का दिन केवल उत्सव नहीं,
बल्कि एक आत्मविश्वास का संचार था जो उनके जीवन में नई प्रेरणा लेकर आया।

विद्यालय का वादा — हर बेटी को मिलेगा उसका अधिकार

कार्यक्रम के समापन पर प्रधानाध्यापक डॉ. सतीश कुमार ने
बालिकाओं की शिक्षा और सशक्तिकरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

उन्होंने कहा कि विद्यालय में आने वाले महीनों में
‘नेतृत्व प्रशिक्षण शिविर’, ‘आत्मरक्षा कार्यशाला’ और
‘करियर मार्गदर्शन कार्यक्रम’ आयोजित किए जाएंगे।

उन्होंने यह भी घोषणा की कि विद्यालय परिसर में
बालिका प्रेरणा कोना” बनाया जाएगा,
जहाँ बेटियों की सफल कहानियाँ प्रदर्शित की जाएंगी।

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‘लक्ष्मी की कहानी’ बन गई उम्मीद की मिसाल

इस कार्यक्रम के बाद लक्ष्मी अपने दोस्तों के साथ मुस्कुराती नजर आई।
उसकी आंखों में सपनों की चमक और दिल में गर्व का भाव था।
उसकी मां, जो एक गृहिणी हैं, ने भावुक होकर कहा —

“मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरी बेटी स्कूल की प्रधानाध्यापिका बनेगी,
चाहे एक दिन के लिए ही सही। आज मुझे उस पर गर्व है।”

लक्ष्मी की यह छोटी-सी उपलब्धि न केवल उसके परिवार बल्कि पूरे गांव के लिए
गौरव और प्रेरणा का स्रोत बन गई है।

समापन: बेटियाँ हैं समाज की सबसे बड़ी शक्ति

कार्यक्रम के अंत में सभी छात्राओं ने मिलकर नारा लगाया —

“हम बेटी हैं, हमें न रोकिए, हमें बस उड़ने दीजिए।”

विद्यालय प्रांगण तालियों और खुशियों से भर उठा।
यह दिन इस बात का प्रतीक बन गया कि अगर समाज बेटियों पर विश्वास करे,
तो वे हर क्षेत्र में इतिहास रच सकती हैं।

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