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Agra Breaking News: डायट आगरा में सार्वभौमिक मानव मूल्य कार्यशाला, प्राचार्य अनिरुद्ध यादव बोले – मानव मूल्य शाश्वत हैं

डायट आगरा में एआरपी, एसआरजी और मेंटर्स के लिए सार्वभौमिक मानव मूल्यों पर एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित। प्राचार्य अनिरुद्ध यादव ने कहा कि मानव मूल्य समय, काल और परिस्थिति पर निर्भर नहीं होते। शिक्षा में नैतिक मूल्यों पर दिया गया विशेष जोर।

“मानव मूल्य समय, काल और परिस्थिति पर निर्भर नहीं” — डायट आगरा में सार्वभौमिक मानव मूल्यों पर गहन मंथन

Saleem Sherwani

एस. शेरवानी (ब्यूरो चीफ़)
आगरा | 21 फरवरी 2026

जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट) आगरा के सभागार में सार्वभौमिक मानव मूल्यों विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। यह कार्यशाला जनपद के समस्त एआरपी, एसआरजी एवं डायट मेंटर्स के लिए आयोजित की गई, जिसमें लगभग 70 प्रतिभागियों ने सहभागिता की।

कार्यक्रम का शुभारंभ डायट आगरा के प्राचार्य अनिरुद्ध यादव ने मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन कर किया। अपने उद्घाटन संबोधन में उन्होंने कहा कि मानव मूल्य किसी भी परिस्थिति, समय या कालखंड पर निर्भर नहीं होते। वे सार्वभौमिक और शाश्वत हैं। यदि शिक्षा के माध्यम से इन मूल्यों को विद्यार्थियों तक पहुंचाया जाए, तो समाज में स्थायी सकारात्मक परिवर्तन संभव है।

शिक्षा का मूल उद्देश्य: मानवीय आचरण का विकास

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कार्यक्रम की मुख्य वक्ता हिंदुस्तान कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी की डॉ. ममता शर्मा ने “समग्र विकास में शिक्षा की भूमिका” विषय पर विस्तार से व्याख्यान दिया।

उन्होंने कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्ति या ज्ञान संचय नहीं है, बल्कि मानव में मानवीय आचरण के साथ जीने की योग्यता विकसित करना है।

डॉ. शर्मा ने बताया कि जब व्यक्ति सही समझ, स्वस्थ संबंध और संतुलित सुविधाओं के आधार पर जीवन जीता है, तभी उसे वास्तविक तृप्ति प्राप्त होती है। शिक्षा यदि मानव मूल्यों से जुड़ी हो, तो वह केवल सूचना नहीं बल्कि जीवन दृष्टि प्रदान करती है।

मानव जीवन के चार स्तरों पर विस्तृत चर्चा

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सत्र के अगले चरण में डॉ. युधिष्ठिर सिंह ने मानव जीवन के चार स्तरों पर गहन चर्चा की—

  1. मानव में व्यवस्था – व्यक्ति के भीतर विचार, भावना और व्यवहार में संतुलन

  2. परिवार में व्यवस्था – परिवार के सदस्यों के बीच विश्वास और सामंजस्य

  3. समाज में व्यवस्था – सामाजिक उत्तरदायित्व और सहयोग

  4. प्रकृति में व्यवस्था – पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता और संतुलन

उन्होंने कहा कि मानव केवल शरीर नहीं है, बल्कि चैतन्य और शरीर का सह-अस्तित्व है। दोनों की आवश्यकताएं अलग-अलग हैं, इसलिए जीवन में संतुलन आवश्यक है।

परिवार व्यवस्था के संदर्भ में उन्होंने नौ प्रमुख भावों—विश्वास, सम्मान, ममता, वात्सल्य, गौरव, कृतज्ञता और प्रेम—का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि ये भाव परिवार में जीवित रहें, तो परिवार में सामंजस्य बना रहता है और समाज भी सुदृढ़ होता है।

भौतिकता बनाम वास्तविक मानव मूल्य

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कार्यशाला में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि भौतिक वस्तुओं का संग्रह और सुख-सुविधाओं पर अत्यधिक निर्भरता मानव मूल्य नहीं है।

वास्तविक मानव मूल्य वह है—

  • जो आत्मसंतुष्टि प्रदान करे

  • जो दूसरों के जीवन में सकारात्मक प्रभाव डाले

  • जो समाज में शांति और सहयोग को बढ़ावा दे

वक्ताओं ने कहा कि जब हमारे आचरण से दूसरों को प्रसन्नता मिलती है, तभी सच्चे मानव मूल्यों की स्थापना होती है।

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राज्य स्तर के निर्देशन में आयोजन

कार्यक्रम के नोडल प्रभारी डॉ. मनोज कुमार वार्ष्णेय ने बताया कि यह कार्यशाला राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद उत्तर प्रदेश के तत्वावधान में आयोजित की गई।

उन्होंने कहा कि एआरपी, एसआरजी और डायट मेंटर्स को प्रशिक्षित कर शिक्षा व्यवस्था में मानव मूल्यों को समाहित करने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि ये प्रशिक्षक अपने-अपने क्षेत्रों में शिक्षकों और विद्यार्थियों तक इस संदेश को पहुंचा सकें।

शिक्षकों का सक्रिय सहयोग

कार्यक्रम के सफल आयोजन में सह-नोडल प्रभारी लक्ष्मी शर्मा, कल्पना सिन्हा, संजीव कुमार सत्यार्थी, अनिल कुमार, पुष्पेंद्र सिंह, यशपाल सिंह, रंजना पांडे, अबू मुहम्मद आसिफ, डॉ. दिलीप कुमार गुप्ता सहित अन्य शिक्षकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

सभी प्रतिभागियों ने विषय पर सक्रिय चर्चा की और अपने अनुभव साझा किए, जिससे कार्यशाला संवादात्मक और प्रभावी बनी।

शिक्षा के माध्यम से संस्कारित समाज की दिशा में पहल

डायट आगरा में आयोजित यह कार्यशाला केवल एक प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं, बल्कि शिक्षा को मूल्य-आधारित बनाने की दिशा में एक सशक्त कदम है।

आज के भौतिकतावादी और प्रतिस्पर्धात्मक दौर में यदि विद्यार्थियों को प्रारंभ से ही सार्वभौमिक मानव मूल्यों से संस्कारित किया जाए, तो वे न केवल सफल नागरिक बनेंगे बल्कि संवेदनशील और जिम्मेदार मानव भी बनेंगे।

यह पहल दर्शाती है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल अकादमिक उपलब्धि नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों से समृद्ध समाज का निर्माण भी है।

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